Saturday, July 10, 2010

हमारी संवेदना .....

                                                                     अतीत  कभी-कभी सहेज कर रखने  कि चीज होती है पर कभी-कभी अतीत  के  काले  अध्यायों  को लोग भूल जाने कि  कोशिश करते हैं  जो कि किफी दुखद और अशांति लिए हुए होता है  शायद भोपाल हादसा भी उन्ही में से  है 
                                                                        मानवीय सम्वेदनाओं का अंत इनती जल्दी हो जायेगा कभी सोचा ना था ! मुझे आश्चर्य होता है कि दशकों के दर्द से कराहते   भोपाल को अब भी लम्बी जद्दोजहद करना पड़ रहा है . वो भी अपने प्रति हुए नाइंसाफ़ी के इंसाफ के लिए , अपने साथ हुए जुल्म के लिए ! .  हमारी न्यायिक वयवस्था  को लगता है कि जैसे घुन लग गया हो. कोई भी तंत्र ठीक से काम नहीं  कर  रहा   है .और  हम  चद   लोग अपने आप पे इतरा रहे हैं . बार बार हम अपनी न्यायिक व्यवस्था को ठीक करने   कि बात तो करते हैं पर कुछ करते नहीं .    

                                                                                                  
ये बात जग जाहिर है कि विश्व कि सबसे बड़ी औधोगिक हादसों के लिए कौन कौन जिम्मेदार हैं.?  किन-किन लोगों ने अपनी जिम्मेदारियों तथा कर्तब्यों का निर्वहन  ठीक तरीकों से नहीं किया ?.  लेकीन अब तक इसपर फैसला नहीं  कर पायें हैं . यह बहुत तकलीफ पहुचने वाली बात है . इनसे जुड़े मुद्दों को लेकर हम संवेदनशील भी  नहीं हैं.
                                 यूनियन कार्बाइड  और तत्कालीन सरकारों के  कारनामो को पचा पाना आसान काम नहीं वरण मुश्किल  है  . उन्हें तबके समय में जिम्मेदारी से पेश आना चाहिए था लेकीन उन्होंने अपने कर्तव्यों का निर्वहन ठीक ढंग से नहीं किया.इसमें कोई दो राय नहीं है कि उन्होंने जो कुछ भी  किया और कर रहे हैं वो घर्णित  है.
                                        इनके पुनर्वास , मुलभुत आवश्यकताओं कि पूर्ति , खाद्य पदार्थों , आवास .स्वाश्थ्य सुबिधाओं के तरफ भी काम करना चाहिए था . लेकीन  हादसों के दशकों   बाद भी   अभी तक मुआबजा तक नहीं मिला है.  ये मानसिक असंवेदनशीलता कि पराकाष्ठा है ? इन सब कामो के लिए सरकार और अदालत के पास वक्त नहीं है .
                                           सरकारों का यूनियन कार्बाइड का समर्थन करना , मानवाधिकारों कि दुहाई देने वाला और न्याय के नाम पर युद्ध करने वाला,   अपनी ताकत से दूसरों कि बोलती बंद करा देना वाला  अमेरिका को  शायद ये एक मामूली घटना लगती हो .  इनके लिए तो दूसरों कि जाने  सस्ती होती है . बात जब अपने पे आये तो बड़ा असर रखती  है . इसी तरह सभी अपनी-अपनी  गलतियों को नजरअंदाज़ करेगे तो ,इससे बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात क्या होगी.  

बेसक मेरी बात सबको कड़बी लगेगी लेकीन ये सच्चाई है हम इसे झुठला नहीं सकते   . और  अपने दायित्वों से   मुह चुराना उचित नहीं होगा . जरुरत है सभी लोगों को आइनों   में अपने आप  को देखने कि और अभी भी अपनी गलतियों को सुधारने कि .
विजयकुमार 

1 comment:

  1. विजय जी आप की बात किसे कडवी लग सकती है ,,, इस असंवेदन शील सरकार और पूंजीवादी व्यवस्था की ओर जो आपने ऊँगली उठायी है ,,एक दम सही है ,, मित्र मै जायदा क्या बोलूं सब की जड़ हमारी अपनी व्वस्था है जिसमे परिवर्तन की आवश्यकता है ,,,,, और उसमे परिवर्तन तभी होगा जब हम अपने अधिकारों से जयादा अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो जाये गे
    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

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