हर देश में चंद लोग इंसानियत के दुश्मन होते हैं. जो चोला तो पहनते हैं रहनुमा का और होते हैं इसके उल्टा .मैं बात कर रहा हूँ एक पूर्ब मंत्री जी का जो की मानव इतिहास की सबसे बड़ी औधौगिक त्रासदी केलिए जिम्मेदार यूनियन कार्बाइड को बचा रहे थे वो भी इंसानियत के रहनुमा बनकर. जब हादसा हुआ थो तब वो मानवता को कलंकित करने की प्रकासठा तक को लाँघ चुके थे . शयद उन्हें ये सब करते हुए शर्म भी नहीं आयी होगी. आखिर मानवता के रहनुमा जो ठहरे .
मैने सुना था की रहनुमा तो अपने आप को भी इंसानियत के भलाई के लिए कुर्बान कर देता है फिर ये उनकी कैसी क़ुरबानी है ? अभी भी ऐसे लोग इंसानियत की ही दुहाई देते हैं. मै तो आश्चर्यचकित हूँ क्या अब भी उन्हें शर्म नहीं आती अब तो उनकी अंतिम बेला है अब तो बक्श दें ?शायद एसे लोग अपने पापों का प्रायश्चित भी करना नही चाहते !अब भी वो इंसानियत की भलाई के नाम पर जनता के गुमराह करते रहना चाहतें हैं.मेरा मन कभी कभी इन बातों से उद्वेलित हो उठता है क्या उनका मन भी उद्वेलित होता होगा ? मै इसी उधेरबुन में अपने आप को सोचता हूँ कभी तो उनका मन इन बातों को सोचता होगा. अरे हाँ उनकी बाजीगरी को मै भूल ही जाता हूँ -इनका स्टेटमेंट की अगर उन्हें दोबारा मौका मिले तो वे एसी गलती नहीं दुहराएगें .
लेकीन प्रश्न उठता है की जो गलती हुई उसको सुधारने के लिए उन्होंने क्या क्या किये ? कभी उन की हुई गलतियों के प्रायश्चित के लिए भी कुछ किया ? मै अब भी निरुतर हूँ की इन्होने कुछ किया होगा .यह कहना किसी के लिए भी आसान हो सकता है कि वह अतीत की गलतियों को नहीं दोहराएगा . किसी बौद्धिक सोंच विचार वाले व्यक्ति से अपेक्षा होती है कि वर्तमान में वैसे निर्णय ले कि भविष्य में उसे पछतावा न हो . करना कठिन है कहना आसान .आज ये लोग इंसानियत के कठघरे में खडें है लेकीन आम सोच समझ वाला कोई भी व्यक्ति जरुर अपनी गलतियों को सुधारना चाहेगा . काश ऐशा हो पाता ?
विजय कुमार
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